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विजयी कल्पना

  • Writer: Sundeshajynt
    Sundeshajynt
  • Dec 27, 2020
  • 1 min read

किसी प्रकार का अभ्यास तभी संभव है जब हम अपने मानसिक उप-आराम की अवस्था को प्राप्त नहीं कर ले


वह उपराम अवस्था की शुरुआत हमे कल्पना को खुले राह से मन मे आने देने से होगी


अपने आप के प्रति समर्पण होकर कल्पना के सभी चित्रण को देखना और मन मे आए सभी बुरे भले विचारों को आने जाने देना मानसिक स्थिरता के लिए अति आवश्यक सा होता है

यह अभ्यास मानसिक "सैथिलीकरण" का अभ्यास कहलाता है जो अपने आपके के प्रति पूर्ण समर्पित होता है



पहले पहल तो हमे अपने मन को खुली मनमानी करने देनी पड़ती हैं इस की वज़ह साफ है कि मन की हठ एक छोटे बालक की हठ से ज्यादा ताकतवर और पाक होती है जिसे रोकना एक मुर्ख हास्यास्पद काम मे समय की बर्बादी जैसा ही होगा


और अगर हम बालक की बात को ना भी माने तो क्या इससे उस बालक को कुछ भी हानि या लाभ नहीं होता

बल्कि वह हमारे डर के वशीभूत होकर हमारा मन ही मन शत्रु बन बैठता हैं फिर उसका उत्साह एक नकारात्मक ऊर्जा की ओर झुक जाता है धीरे-धीरे उद्दंड स्वरुप धार लेता है अथवा वो निकम्मा सा हो जाएगा तो बस


जो सावधानियां एक सुयोग्य अभिभावक अपने बालक को वश में लाने के लिए करता है वही हमे भी अपने मनोविकारों को कल्पना शक्ति से वश में लाने के लिए करना होता है


"मन पर कल्पना की शक्ति सर्वोपरि हैं"


कल्पना हमेशा विजयी रहीं हैं  इच्छा के आगे.....
Need




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